मंगलवार 22 सितंबर 2026 - 00:38
आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद मूसा शुबैरी ज़ंजानी (र) ने किताबों के साथ पूरी ज़िंदगी गुज़ारी, शोध को इबादत का दर्जा दियाः मौलाना हुसैन महदी

आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद मूसा शुबैरी ज़ंजानी (र) उन विद्वानों में से थे, जिन्होंने इल्म को केवल एक पद नहीं समझा, बल्कि उसे एक ज़िम्मेदारी मानकर पूरी ज़िंदगी निभाया। फ़िक़्ह और उसूल में गहरी समझ, इल्म-ए-रिजाल और जीवनी के क्षेत्र में असाधारण शोध, हदीस और इतिहास के स्रोतों से गहरी परिचितता, इल्मी सावधानी, तक़वा, विनम्रता और गंभीरता उनकी शख्सियत के वे पहलू थे, जिन्होंने उन्हें समकालीन हौज़ा-ए-इल्मिया में एक विशिष्ट स्थान प्रदान किया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, आज हौज़ा-ए-इल्म और फ़क़ाहत का एक रोशन अध्याय बंद हो गया। आज इल्म की एक खामोश लेकिन महान शमा बुझ गई। आज फ़िक़ाहत की वह बुलंद आवाज़ खामोश हो गई, जिसकी गूंज कई दशकों से हौज़ात-ए-इल्मिया, धार्मिक मदरसों और अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम के मक्तब के इल्मी हलकों में सुनाई देती रही। हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद मूसा शुबैरी ज़ंजानी क़ुद्दिस सिर्रुहू का निधन केवल एक बुज़ुर्ग आलिम की मृत्यु नहीं है, बल्कि यह आलमी-ए-तशय्युअ के इल्मी सरमाये का अपूरणीय नुकसान है।

आलिम की मौत, पूरे आलम की मौत है।

जब एक आलिम दुनिया से विदा होता है तो केवल एक व्यक्ति नहीं जाता, बल्कि अपने साथ एक पूरा दौर ले जाता है। एक शिक्षक, एक शोधकर्ता, एक फ़क़ीह, इल्म-ए-रिजाल के विशेषज्ञ, एक मार्गदर्शक, गहरी दृष्टि रखने वाला विद्वान और ऐसा इल्मी मिज़ाज विदा होता है, जिसे बनाने में केवल आधी सदी नहीं बल्कि पूरी ज़िंदगी लग जाती है। इसी कारण पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि से वर्णित यह बात आज पहले से कहीं अधिक दिल को छूती है कि जब कोई आलिम दुनिया से विदा होता है तो इस्लाम में ऐसी दरार पैदा होती है, जिसे क़यामत तक कोई चीज़ पूरा नहीं कर सकती।

हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद मूसा शुबैरी ज़ंजानी रहमतुल्लाह अलैह उन विद्वानों में से थे, जिन्होंने इल्म को केवल एक पद नहीं समझा, बल्कि उसे एक ज़िम्मेदारी मानकर पूरी ज़िंदगी निभाया। फ़िक़्ह और उसूल में गहरी समझ, इल्म-ए-रिजाल और जीवनी के क्षेत्र में असाधारण शोध, हदीस और इतिहास के स्रोतों से गहरी परिचितता, इल्मी सावधानी, तक़वा, विनम्रता और गंभीरता उनकी शख्सियत के वे पहलू थे, जिन्होंने उन्हें समकालीन हौज़ा-ए-इल्मिया में एक विशिष्ट स्थान प्रदान किया।

वह केवल एक मरजा-ए-तक़लीद नहीं थे, बल्कि एक इल्मी परंपरा के अमीन थे।

वह उस पीढ़ी के अंतिम बड़े स्तंभों में शामिल थे, जिसने बुज़ुर्ग उस्तादों की शिक्षण सभाओं में बैठकर इल्म हासिल किया, किताबों के साथ पूरी ज़िंदगी गुज़ारी, शोध को इबादत का दर्जा दिया और फ़िक़ाहत को केवल फ़तवों के संकलन तक सीमित नहीं रखा।

उनकी ज़िंदगी हमें यह सीख देती है कि किसी आलिम की असली महानता उसके आसपास जमा होने वाली भीड़ में नहीं, बल्कि उसके इल्म की गहराई, चरित्र की पवित्रता और सत्य के सामने उसकी इल्मी ईमानदारी में होती है।

हज़रत आयतुल्लाह शुबैरी ज़ंजानी रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी लंबी इल्मी ज़िंदगी में अध्यापन किया, शोध किया, शागिर्द तैयार किए, फ़िक़्ह और उसूल के विषयों को आगे बढ़ाया, इल्म-ए-रिजाल के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया और हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम में ऐसी इल्मी पहचान स्थापित की, जिसे आने वाली पीढ़ियां भी याद रखेंगी। उनके निधन पर जारी किए गए शोक संदेशों में भी उनकी इल्मी मेहनत, शागिर्दों की शिक्षा-दीक्षा, तक़वा, इख़लास और शिया फ़िक़ाहत की विरासत की रक्षा को प्रमुखता से याद किया गया है।

लेकिन आज जब हम उनके निधन की खबर पढ़ते हैं तो सवाल केवल यह नहीं है कि एक मरजा दुनिया से चला गया। असली सवाल यह है कि हमने उनकी ज़िंदगी से क्या हासिल किया?

क्या हमने इल्म की क़द्र करना सीखा?

क्या हमने शोध की अहमियत को समझा?

क्या हमने मतभेद के बावजूद इल्मी अदब को ज़िंदा रखा?

क्या हमने यह समझा कि एक आलिम-ए-दीन की महानता केवल उसके कपड़ों, अमामे और पद में नहीं, बल्कि उसकी इल्मी ईमानदारी, तक़वा, इख़लास और सेवा में होती है?

और सबसे बढ़कर, क्या हमने यह महसूस किया कि जब ऐसे बुज़ुर्ग एक-एक करके दुनिया से विदा होते हैं तो केवल इतिहास के पन्ने ही खाली नहीं होते, बल्कि हमारी अपनी इल्मी दुनिया भी कुछ हद तक अनाथ हो जाती है?

आज क़ुम का माहौल शोकाकुल है, हौज़ात-ए-इल्मिया ग़मगीन हैं, शागिर्दों की आंखें अश्कबार हैं, अहले-इल्म के दिलों पर बोझ है और मक्तब-ए-अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम से प्रेम रखने वाले करोड़ों लोग इस दुखद निधन पर शोकाकुल हैं।

यह वह अवसर है जहां शब्द अपनी अहमियत खो देते हैं।

उस शख्सियत के बारे में क्या लिखा जाए, जिसकी पूरी ज़िंदगी ही इल्म थी?

उस फ़क़ीह के बारे में क्या कहा जाए, जिसने दशकों तक फ़िक़ाहत की शमा रोशन रखी?

और उस नुकसान का अंदाज़ा किस भाषा में लगाया जाए, जिसे हौज़ा-ए-इल्मिया ने आज महसूस किया है?

हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा शुबैरी ज़ंजानी रहमतुल्लाह अलैह के कार्यालय की ओर से जारी बयान में भी उनकी जीवनभर की इल्मी मेहनत, असली फ़िक़ाहत के संरक्षण और विकास, इस्लामी शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार, तशय्युअ की इल्मी और आस्थागत पहचान की रक्षा तथा जनता के प्रति भलाई और हमदर्दी को उनकी ज़िंदगी की प्रमुख विशेषता बताया गया है।

यही किसी आलिम की असली विरासत होती है।

इमारतें मिट जाती हैं, पद समाप्त हो जाते हैं, सभाओं के दृश्य बदल जाते हैं, पीढ़ियां बदल जाती हैं, लेकिन अगर इल्म को इख़लास के साथ आगे पहुंचा दिया जाए तो वह मृत्यु के बाद भी जीवित रहता है।

आयतुल्लाह शुबैरी ज़ंजानी रहमतुल्लाह अलैह भी अपने शागिर्दों, अपनी शोध-रचनाओं, अपने इल्मी آثار और अपनी इल्मी परंपरा के माध्यम से जीवित रहेंगे।

मौत उनके शरीर को हमसे अलग कर सकती है, उनके इल्म को नहीं।

आज हम इस महान दुखद घटना पर हज़रत वली-ए-अस्र इमाम महदी अज्जलल्लाहु तआला फ़राजहू की बारगाह में ताज़ियत पेश करते हैं। मराजे-ए-इज़ाम, उलमा-ए-इलाम, हौज़ात-ए-इल्मिया, शागिर्दों और श्रद्धालुओं, सम्मानित परिवार तथा विशेष रूप से मक्तब-ए-अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम के सभी अनुयायियों की सेवा में हार्दिक संवेदना और ताज़ियत पेश करते हैं।

अल्लाह तआला इस फ़क़ीह-ए-अहले-बैत के दर्जे बुलंद फरमाए, उन्हें मुहम्मद और आले-मुहम्मद अलैहिमुस्सलाम के पड़ोस में स्थान प्रदान करे, उनकी इल्मी और दीनी सेवाओं को स्वीकार करे और उनके परिवार, शागिर्दों, संबंधित लोगों तथा सभी शोकाकुलों को सब्र-ए-जमील प्रदान करे।

और शायद आज इस पूरी ताज़ियत को केवल एक वाक्य में समेटा जा सकता है:

एक आलिम विदा नहीं हुआ, बल्कि एक पूरा इल्मी दौर विदा हो गया।

इन्ना लिल्लाहे वा इन्ना इलैहे राजेऊन

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